त्रिपिंडी श्राद्ध पुस्तक PDF Download | Tripindi Shradha Book PDF in Hindi | Tripindi Shraddha Vidhi

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कहते हैं काशी में जो मनुष्य अंतिम सांस लेता है, शिव उसे अपने श्रीचरणों में स्थान देते हैं। इससे मृतात्मा को मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु की व्याधियों से मुक्ति दिलाने के लिए काशी के पिशाचमोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध संस्कार किया जाता है। यह श्राद्ध कर्म काशी के अलावा कहीं और नहीं होता है। इसका वर्णन स्कंद और गरुड़ पुराण में मिलता है।

काशी के पिशाचमोचन कुंड पर त्रिपिंडी श्राद्ध कर्म पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु की बाधाओं से मुक्ति दिलाता है। कुंड की उत्पत्ति गंगा के धरती पर आने से भी पूर्व हुई है। इसके पास पीपल का पेड़ है। पेड़ पर एक सिक्का रखवाया जाता है। इससे पितर ऋण मुक्त हो जाते हैं। यजमान भी पितृ ऋण से मुक्त हो जाते हैं। प्रेत बधाएं तीन प्रकार की होती हैं। इनमें सात्विक, राजस, तामस शामिल हैं। तीनों बाधाओं से पितरों को मुक्ति दिलवाने के लिए काला, लाल और सफेद झंडे लगाए जाते हैं।

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त्रिपिंडी श्राद्ध पुस्तक Tripindi Shradha Book PDF in Hindi 

  • PDF Name: त्रिपिंडी श्राद्ध पुस्तक Tripindi Shradha Book
  • Pages: 65
  • Size: 11.92
  • Format: Application/PDF
  • Language: Hindi
  • Keywords: त्रिपिंडी श्राद्ध
  • Type: Book

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त्रिपिंडी श्राद्ध

नमस्कार पाठकों, प्रस्तुत लेख के माध्यम से आप त्रिपिंडी श्राद्ध पुस्तक पीडीऍफ़ के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। त्रिपिंडी श्राद्ध का अर्थ है पिछली तीन पीढ़ियों के हमारे पूर्वजों के पिंड दान। अगर पिछली तीन पीढ़ियों से परिवार में यदि किसी का भी बहुत कम उम्र या बुढ़ापे में निधन हो गया हो। तो वे लोग हमारे लिए समस्या पैदा करते हैं। उन लोगों को मुक्त अथवा उनकी आत्मा की शांति के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध करना पड़ता है। प्रियजनों लोगों की याद में त्रिपिंडी श्राद्ध एक योगदान मन जाता है ।

ऐसा माना जाता है की यदि लगातार तीन वर्षों तक यह योगदान नहीं किया गया तो वे प्रियजन (मृतक) क्रोधित हो जाते है । इसलिए उन्हें शांत करने के लिए ये योगदान किए जाते हैं। अधिकांश लोगों का विचार है कि त्रिपिंडी का अर्थ है 3 पीढ़ी के पूर्वजों (पिता-माता, दादाजी-दादी और परदादा- परदादी ) को संतुष्ट करना। लेकिन यह 3 पीढ़ियों के साथ प्रकट नहीं होता है। अपितु वे तीन  ‘अस्मदकुले’, ‘मातमहा’, भ्राता  पक्ष , ससुराल पक्ष और शिक्षक पक्ष का संकेत देते हैं।

त्रिपिंडी श्राद्ध तिथि | त्रिपिंडी श्राद्ध मुहूर्त २०२१

तृतीया तिथि का यह है मान : आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृपक्ष का मान है। यह पखवारा इस बार 16 दिन का है। तृतीया तिथि का मान दो दिन होने के कारण एक दिन की वृद्धि हो रही है। तृतीया तिथि 23 सितंबर को सुबह 5:58 बजे से 24 सितंबर को सुबह 7:17 बजे तक रहेगी। जिस तिथि को श्राद्ध कर्म किया जाता है, उस तिथि का मध्याह्न में मिलना जरूरी है। इस कारण 23 सितबंर को तृतीया तिथि जबकि 24 को चतुर्थ तिथि का श्राद्ध कर्म होगा।

त्रिपिंडी श्राद्ध पूजा

त्रिपिंडी श्राद्ध में ब्रम्हा, विष्णु तथा महेश की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन करने का विधान है। जो आत्मा आपको परेशान कर रही थी वह त्रिपिंडी श्राद्ध के बाद प्रेत योनि से मुक्त हो जाएगी।

  • पितृ दोष से बचने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कराना आवश्यक है
  • प्रत्येक माह की अमावस्या की इसकी पूजा की जा सकती है
  • इस पूजा के लिए पितृ पक्ष सबसे उत्तम समय है

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त्रिपिंडी श्राद्ध क्यों कराया जाता है?

ज्योतिषाचार्य सुजीत जी महाराज के अनुसार पितृ दोष से बचने के लिए त्रिपिंडी श्राद्ध कराना आवश्यक है। आपकी कुंडली में ग्रहों की चाहे जितने भी अच्छी स्थिति हो लेकिन यदि पितृ दोष है तो जीवन में तमाम प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।  ऐसे में घर में धन का खर्च बीमारियों में होने लगता है। संतान प्राप्ति में बाधा होती है तथा यदि संतान होती भी है तो प्रगति नहीं कर पाती तथा स्वास्थ्य से कष्ट उठाती है। इससे अचानक दुर्घटना के योग भी बनते हैं। प्रत्येक माह की अमावस्या की इसकी पूजा की जा सकती है लेकिन पितृ पक्ष इसके लिए सबसे बेहतर समय है।

त्रिपिंडी श्राद्ध विधि

त्रिपिंडी श्राद्ध में ब्रम्हा, विष्णु तथा महेश की प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन करने का विधान है। हमें जो आत्मा परेशान करती है उसके लिए अनदिष्ट गोत्र शब्द का प्रयोग किया जाता है क्योंकि वह अज्ञात होती है। प्रेतयोनि प्राप्त उस जीवात्मा को संबोधित करते हुए यह श्राद्ध किया जाता है। इस विधि को श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, फाल्गुन तथा वैशाख में 5, 8,11,13,14 तथा 30 में शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष की तिथियों में भी किया जा सकता है। पितृ पक्ष इस पूजा के लिए सबसे उत्तम समय है।

तीन प्रेत योनियां-

तमोगुणी, रजोगुणी तथा सतोगुणी ये तीन प्रेत योनियां हैं। पिशाच तमोगुणी होते हैं। अंतरिक्ष में रजोगुणी तथा वायुमंडल में सतोगुणी पिशाच होते हैं । इन तीनों प्रकार की प्रेतयोनियों की पीड़ा को मिटाने के लिए पितृ पक्ष में त्रिपिंडी श्राद्ध बहुत आवश्यक है। आदित्यपुराण कहता है कि श्राद्ध न करने से पितर लोग अपने वंशजों को बहुत परेशान करते हैं। जो लोग कई वर्षों से श्राद्ध नहीं किये हैं उनके लिए त्रिपिंडी श्राद्ध करवाना बहुत जरूरी है। प्रेतबाधा, गृहक्लेश, भूतबाधा,अशांति,बीमारी,अकाल मृत्यु व तमाम समस्याओं के निदान हेतु श्राद्ध पक्ष में त्रिपिंडी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

त्रिपिंडी श्राद्ध सामग्री

धूप बत्ती (अगरबत्ती), कपूर, केसर, चन्दन, यज्ञोपवीत, कुमकुम, चावल, अबीर, गुलाल, अभ्रक, हल्दी, आभूषण, नाड़ा, रुई, रोली, सिंदूर, सुपारी, पान के पत्ते, पुष्पमाला, कमलगट्टे, धनिया खड़ा सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, कुशा व दूर्वा, पंच मेवा, गंगाजल, शहद (मधु), शकर, घृत (शुद्ध घी), दही, दूध, ऋतुफल, नैवेद्य या मिष्ठान्न (पेड़ा, मालपुए इत्यादि) इलायची (छोटी), लौंग, मौली, इत्र की शीशी, सिंहासन (चौकी आसन), पंच पल्लव।

त्रिपिंडी श्राद्ध करने से क्या लाभ होता है?

ऐसी मान्यता है कि यहां त्रिपिंडी श्राद्ध करने से पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद व्याधियों से मुक्ति मिल जाती है। इसीलिये पितृ पक्ष के दिनों में पिशाच मोचन कुंड पर लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है। श्राद्ध की इस विधि और पिशाच मोचन तीर्थस्थली का वर्णन गरुण पुराण में भी मिलता है।

त्रिपिंडी कौन कर सकता है?

विवाहित और अविवाहित दोनों ही त्रिपिंडी श्राद्ध कर सकते हैं। केवल अविवाहित महिलाएं त्रिपिंडी श्राद्ध नहीं कर सकती हैं। परिवार का कोई भी व्यक्ति त्रिपिंडी श्राद्ध कर सकता है।

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