शनि प्रदोष की कथा और महत्व | Shani Pradosh Vrat Katha PDF Download in Hindi

हम आपके लिये शनि प्रदोष व्रत कथा pdf की जानकारी प्रदान कर रहे हैं। हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व है। शनिवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोष व्रत कह जाता है। इस दिन भगवान शिव के साथ शनि देव की पूजा भी की जाती है। शास्त्रों के अनुसार, शनि प्रदोष व्रत के दिन शनि देव को काला तिल, काला वस्त्र, तेल, उड़द की दाल अर्पित करना शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शनि प्रदोष व्रत के दिन भगवान शनि देव को ये चीजें अर्पित करने से भक्तों पर अपनी कृपा बरसाते हैं। यहाँ से आप शनि प्रदोष व्रत कथा पीडीऍफ़ हिंदी भाषा में बड़ी आसानी से डाउनलोड कर सकते हैं।

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शनि प्रदोष की कथा और महत्व | Shani Pradosh Vrat Katha PDF in Hindi Details

Name शनि प्रदोष की कथा और महत्व | Shani Pradosh Vrat Katha
Pages 6
Size 0.05 MB
Language Hindi

Download PDF of शनि प्रदोष की कथा और महत्व | Shani Pradosh Vrat Katha PDF in Hindi free by using the download link given below.

प्रत्‍येक मास की हर त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत होता है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि इस बार 4 सितंबर 2021 दिन शनिवार को पड़ रही है। यह भाद्रपद मास का पहला प्रदोष व्रत है जो क‍ि शनिवार के दिन होने से शन‍ि प्रदोष व्रत के रूप में मान्य है। शन‍ि प्रदोष व्रत का धार्मिक रूप से काफी महत्व है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से जीवन की कई परेशानियों से शनिदेव और भगवान शिव मुक्ति दिलाते हैं। इतना ही नहीं इस व्रत को करने से सहस्त्र गायों के दान का पुण्य प्राप्त होता है। आइए जानते हैं शन‍ि प्रदोष व्रत कथा और महत्‍व?

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शन‍िदेव के आराध्‍य और गुरु हैं श‍िवजी धार्मिक ग्रंथों में में भगवान शिव को शनिदेव का गुरु और आराध्य बताया गया है। इसलिए सावन के महीने में शनिदेव और भगवान शिव की पूजा से समस्‍त मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। ऐसी मान्‍यता है क‍ि शनि प्रदोष व्रत करने वाले जातकों को साढ़ेसाती और ढैय्या से छुटकारा मिलता है। इसके साथ ही उनके जीवन में आने वाली अन्‍य समस्‍याएं भी दूर होती हैं। कार्यक्षेत्र में लाभ के साथ, दीर्घायु और पितरों का आशीर्वाद भी मिलता है।

शन‍ि प्रदोष व्रत का ऐसा है महत्‍व

साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। साधु ने सेठ और सेठानी से कहा कि मैं तुम्हारा दुःख जानता हूं। तुम शनि प्रदोष व्रत करो, इससे तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा। साधु ने सेठ-सेठानी प्रदोष व्रत की विधि भी बताई और भगवान शंकर की यह वंदना बताई। दोनों साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत किया इसके प्रभाव से उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ।

शनि प्रदोष व्रत विधि

  • प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं।
  • सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है।
  • इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है।
  • इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है।
  • प्रात: काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्र, गंगाजल, अक्षत, धूप, दीप सहित पूजा करें।
  • संध्या काल में पुन: स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए।
  • इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है।
  • त्रयोदशी तिथि के दिन सूरज उगने से पहले स्नान करके साफ़ वस्त्र धारण कर लें एवं व्रत का संकल्प करें।
  • शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर अथवा घर पर ही बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप, गंगाजल आदि से भगवान शिव की पूजा करें।
  • शिवजी की कृपा पाने के लिए भगवान शिव के मन्त्र ॐ नमः शिवाय का मन ही मन जप करते रहें।
  • प्रदोष बेला में फिर से भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करने के बाद गंगाजल मिले हुए शुद्ध जल से भगवान का अभिषेक करें।
  • शिवलिंग पर शमी, बेल पत्र, कनेर, धतूरा, चावल, फूल, धूप, दीप, फल, पान, सुपारी आदि अर्पित करें।
  • इसके बाद शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें एवं शिव चालीसा का पाठ करें।
  • तत्पश्चात कपूर प्रज्वलित कर भगवान की आरती कर भूल-चूक की क्षमा मागें।

शनि प्रदोष व्रत कथा | Shani Pradosh Vrat Katha in Hindi

प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहाँ से कभी कोई भी ख़ाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी स्वयं काफ़ी दुखी थे। दुःख का कारण था- उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों घुले जा रहे थे। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्‍चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सोंप चल पड़े। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्‍नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नहीं टूटी। मगर सेठ पति-पत्‍नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे। सेठ पति-पत्‍नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूँ वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ।’ साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई।

हे रुद्रदेव शिव नमस्कार। शिव शंकर जगगुरु नमस्कार॥ हे नीलकंठ सुर नमस्कार। शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार॥ हे उमाकान्त सुधि नमस्कार। उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥ईशान ईश प्रभु नमस्कार। विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार॥ तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे। कालान्तर में सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया। शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनके यहाँ छाया अन्धकार लुप्त हो गया। दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे।

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