असली प्राचीन रावण संहिता | Ravan Samhita PDF Book Download

Ravan Samhita pdf | रावण संहिता बुक डाउनलोड | असली प्राचीन रावण संहिता | Ravan sanhita pdf | Ravan Samhita original book | Ravana Samhita pdf | Ravan Samhita book free download | Asli prachin Ravan Samhita free download | ravan samhita book in hindi

ऋषिपुत्र होने के बावजूद रावण देवताओं का विरोधी क्यों बना? कौन सी साधनाएं की थीं उसने, जिन्होंने उसे बना दिया। अपराजेय? भगवान विष्ण को देवताओं से क्यों कहना पड़ा कि अभी वे रावण से आमने सामने युद्ध नहीं कर सकते ? ऐसे ही अनेक प्रश्नों की जानकारी तथा भगवान सदाशिव की उपासना के रहस्य इस संहिता ग्रंथ में प्रस्तुत हैं। इसके अलावा दिव्यास्त्रों के जाता दशानन के चमत्कारिक एवं गुह्य तंत्रशास्त्र तथा औषध विज्ञान का भी समुचित समावेश है इस ग्रंथ में।

शस्त्र शास्त्र मर्मज्ञ दशकंधर के जीवन के रहस्य भरे विभिन्न अनछुए पहलुओं का संस्पर्श करता एक दुर्लभ ग्रंथ! इसे आपके पमक्ष प्रस्तुत किया है ज्योतिषजगत् के शिखर पुरुष पंडित

असली प्राचीन रावण संहिता भाग 1,2,3,4,5 | Ravan Samhita Book/Pustak Pdf Free Download

लेखक शिवकांत झा-Shivkant Jha
भाषा हिन्दी
कुल पृष्ठ 124
Pdf साइज़ 16.7 MB
Category धार्मिक (Religious)

असली प्राचीन रावण संहिता | Ravan Samhita PDF Book Download from link given below

PDF : Double click to Download PDF


Download the PDF : Click Here

असली प्राचीन रावण संहिता

महाज्ञानी रावण कई चीजों में पारंगत था। ज्योतिष शास्त्र में भी उसे महारत हासिल थी। तंत्र शास्त्र का भी वह महाज्ञाता था। इसी वजह से जो भी दशानन के संपर्क में आता था वह सहसा ही उससे मोहित हो जाता था। बहुत कम लोगों को यह पता होगा कि रावण का प्रभाव उसकी तांत्रिक साधना के बल पर था। रावण कई ऐसे उपाय भी करता था जिससे जो भी सामान्य इंसान उसे देखता था वह आकर्षित हो जाता था।

रावण के शक्तिशाली योद्धा, महाज्ञानी, कुशल राजनीतिज्ञ, सेनापति और वास्तुकला का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ वह महापंडित और मायावी भी था. वह लोगों को इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादुई विद्याओं को बखूबी जानता था.

उसने मेघनाद के जन्म से पूर्व मंदोदरी के गर्भ में ही मेघनाद को अमर बनाने के लिये नक्षत्रो को एक स्थिति में ला दिया था. लेकिन आयुकारक कहे जाने वाले शनिदेव ने अपना स्थान बदल लिया जिस वजह से मेघनाद अल्पायु हो गया. कहा जाता है कि लंकापति रावण सभी शास्त्रों का ज्ञाता था और ज्योतिष और तंत्र विद्या की भी उसी ने रचना की थी. इसलिये रावण संहिता में दशानन द्वारा धनवान बनने के उपायों के बारें बताया गया है. इन उपायों को अपनाकर हर कोई अपनी किस्मत को चमका सकता है.

आज के पूरे दिन में हमसे जितने लोग मिलेंगे उनसे हम ऐसा सरल, पवित्र तथा मैत्रीपूर्ण व्यवहार बरतेंगे, जिससे सम्पर्क में आने वाले सभी लोगों को सुख शांति मिले।

कौटुंबिक, सामाजिक, राजनीतिक, साम्प्रदायिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्त क्षेत्रों में प्यार की अपेक्षा दरार की मात्रा अधिक है। सब जगह कलह, वैमनस्य, घृणा, द्वेष, हिंसादि व्याप्त हैं; इनके मूल में है स्वार्थ और अहमभाव। इनका सर्वथा त्याग किये बिना दरार मिट नहीं सकती।

कौटुम्बिक जीवन में पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-भाई में तनाव है। यह तनाव एवं दरार गृहस्थी-सुख का किरकिरा बन जाता है।

जहां परस्पर व्यवहार कटु है, वहां का जीवन नरक बन जाता है। यदि पास रहे हुए व्यक्तियों का परस्पर का व्यवहार मधुर है तो वे सूखी रह सकते हैं; परन्तु यदि लोगों का पारस्परिक व्यवहार कटु हफ तो हलवा, मालपूआ खाकर और लाखो-करोड़ो के भव्य-भवन में पलंग गद्वे पर सोकर भी सुखी नहीें रह सकते। आज-कल लोग जितना धन-संग्रह की चिन्ता में हैं, उतना परस्पर व्यवहार को मधुर बनाने में चिन्ताशील नही हैं। परन्तु जब तक एक जगह पर रहते हुए व्यक्तियों का व्यवहार मधुर नहीं होगा तब तक धन की अपार राशि मिल जाने पर भी जीवन में शान्ति नहीं आ सकती।

ऊपर चर्चा की गई है कि स्वार्थ और अहंकार व्यवहार को बिगाड़ने वाले हैं। मनुष्य हम भोजन, कपड़े, पैसे, जमीन, मकान आदी को लेकर परस्पर लड़ाई आरम्भ कर देता है। वस्तुएं आती और चली जाती है. व्यवहार बिगड़ जाने से हर समय परस्पर कटुता बनी रहती है। अहंभाव भी व्यवहार को बिगाड़ता है। हमारी बातें क्यों न मानी जायं हम स्वयं श्रेष्ठ हैं। हम किसी से संपत्ति क्यों ले! हम जो कहेंगे वही लोगो को करना पड़ेगा । हमारा सम्मान अधिक क्यो न हो! इत्यादी अहमपूर्ण भावनाएं व्यवहार को बिगाड़ देती है। स्वार्थ भाव और अहंकार जब तक नहीं छोड़े जाएंगे, व्यवहार नहीं सुधर सकता। व्यवहार का सुधार हुए बिना शांति नहीं मिल सकती।

स्वार्थ की आसक्ति और अहंकार, ये मनुष्य में प्रबल हैं। माना कि हर प्राणी को स्वार्थ की आवश्यकता है। मनुष्य भी प्राणी है। उसका स्वार्थ तो अधिक व्यापक है। भोजन, वस्त्र, जमीन, मकान सबको चाहीए; क्योंकि इन्हीं से शरीर का निर्वाह चलता है। परन्तु पशु और मनुष्य के स्वार्थ में अन्तर है।

पशुओं के सामने चारा या रोटी डाल दिया जाय तो वे परस्पर लड़कर तथा उसे छीनकर खायेंगे और मनुष्य के बीच रोटी रख दी जाय तो वे उसे बांटकर प्रेमपूर्वक खायेंगें। अतएव जो मनुष्य होकर भी स्वार्थ के लिए लड़ता है और प्रेमपूर्वक निर्वाह नहीं ले पाता, वह पशु है।

We hope this article helped you to Download असली प्राचीन रावण संहिता | Ravan Samhita PDF Book. If the download link of this article is not working or you are feeling any other issue with it, then please report it by choosing the Contact Us link. If the रावण संहिता बुक डाउनलोड is a copyrighted material which we will not supply its PDF or any source for downloading at any cost.

असली प्राचीन रावण संहिता | Ravan Samhita PDF Book Free Download


Leave a Comment